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Jeevan Darshan मित्र और शत्रु दोनों है मन मान्यता और मनोदशा मन का ही खेल.. – दैनिक जागरण (Dainik Jagran)

अगर जीवन के हर माहौल को हम निजी नहीं सार्वजनिक क्षेत्र ही मान लें तो निश्चित रूप से हम अपने मन की आवाज को उसकी सलाह को एकदम बदला बदला सा ही महसूस करेंगे। अचानक ऐसा परिवर्तन इसलिए हो जाता है कि मन विशेष परिस्थितियों में अलग-अलग राय देता है।

पूनम पांडे। मन हमारा मित्र भी है और शत्रु भी। वह हमें अपनी उपस्थिति का एहसास मित्र बनकर ही कराता है। ऐसा मित्र कि वह जो पसंद करता है, हम बस वही करने की कोशिश करने लगते हैं। हम सबकी बात छोड़कर अपने मन की ही सुनते हैं। यदि हमारे पास विवेक नहीं है, तो हम मन के साथ चलते चलते गलत दिशा की ओर भी मुड़ सकते हैं। जब हमें इसका भान होता है, तब हमें इसके शत्रु स्वभाव का पता चल पाता है।
दार्शनिक अरस्तू ने हजारों साल पहले ही अपने शिष्यों को बताया था कि, ‘इस संसार में न तो कुछ अच्छा है और न कुछ बुरा है। हमारे मन की दशा के अनुसार वह अच्छा या बुरा हो जाता है।’ अर्थात हमारी परिस्थितियों का सृजन हमारी मनोदशा करती है। हमें सूक्ष्मता से यह देखना चाहिए कि हमारी मनोदशा का निर्माण करने वाला मन कितना स्वस्थ है। वह हमारे लिए सकारात्मक है या नकारात्मक। इसका परीक्षण हमारा विवेक करता है। हमारी प्रवृत्तियां हमारे मन पर भी निर्भर करती हैं। नकारात्मक प्रवृत्ति वाले को सकारात्मकता मूर्खता लगती है। हरी घास किसी हिंसक पशु के लिए बिल्कुल बेकार है, किंतु गाय के लिए वही जीवनदायिनी और उपयोगी है। यह संसार इतना जटिल नहीं है, जितना हम इसे अपनी मान्यताओं से बना देते हैं। मान्यता और मनोदशा मन का ही खेल है।

जब कृष्ण गोकुल छोड़कर मथुरा जाते हैं तो गोपियां उनसे कहती हैं कि, ‘गोपाल अगर तुम गोकुल से दूर चले जाओगे तो हम सब भयंकर दुख, निराशा से अवसाद मे भर जाएंगी।’ तब कृष्ण कहते हैं, ‘इस सृष्टि में दुख और कष्ट हैं ही नहीं, तुम अपने सोच से उसे रच रहे हो। अगर तुम सब मुझसे ध्यान हटाकर गोपालन में ध्यान केंद्रित करोगे तो सुख ही सुख पाओगे।’ यह सारगर्भित सोच है, जो हर देश-काल परिस्थितियों में प्रासंगिक है।

अत: मन को ध्यान से पढऩे की आवश्यकता है। पाब्लो नेरूदा ने कहा है कि यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि हर इंसान स्वयं से जुड़ा कोई भी पहला सवाल अपने आप से ही पूछेगा और जवाब भी खुद ही देगा। ऐसी स्थिति में एक निरपेक्ष मन सही राय देता है।’ इस बात को ऐसे समझ सकते हैं, कि हम भले ही लाख बैचैनी और परेशानी में हों, पर किसी सार्वजनिक स्थल पर कभी अपना आपा नहीं खोते, कायदे से आचरण करते हैं, बहुत संयम रखते हैं।

मन तो एक ही है, पर वह परिवेश बदलने के साथ अपनी भाषा और तेवर बदल लेता है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम मन के स्वभाव को अपने नियंत्रण में रखते हैं। प्रिय मां कैकेई के पक्षपात और पूजनीय पिता के कठोर आदेश पर भी मन को उपद्रव नहीं करने देते, संतुलित रखते हैं। वहीं मन के उकसाने पर रावण ने अपनी नाभि का अमृत खोया और मन का संयम ही दाधिचि के पंचतत्व की हड्डियों को लौह की ताकत दे पाया।

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