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लघु फिल्म पताल-ती का बुसान फिल्म फेस्टिवल के लिए चयन.. – दैनिक जागरण (Dainik Jagran)

अप्रैल आखिर में दक्षिण कोरिया के बुसान शहर में आयोजित होने वाले 39वें इंटरनेशनल शार्ट फिल्म फेस्टिवल में उत्तराखंड की भोटिया जनजाति पर केंद्रित फिल्म पताल-ती (होली हिमालय) भी प्रदर्शित होगी।
संवाद सहयागी, रुद्रप्रयाग: अप्रैल आखिर में दक्षिण कोरिया के बुसान शहर में आयोजित होने वाले 39वें इंटरनेशनल शार्ट फिल्म फेस्टिवल में उत्तराखंड की भोटिया जनजाति पर केंद्रित फिल्म ‘पताल-ती’ (होली हिमालय) भी प्रदर्शित होगी। फेस्टिवल में प्रदर्शित होने वाली भारत की इस एकमात्र फिल्म के निर्माता-निर्देशक रुद्रप्रयाग जिले के संतोष रावत हैं। वे कई दक्षिण भारतीय फिल्मों में सह निर्देशक रह चुके हैं। 26 मिनट की यह फिल्म पहाड़ में प्रकृति व मानव के बीच के संघर्ष को सामने लाती है।
फेस्टिवल के लिए 111 देशों से 2548 लघु फिल्मों का नामांकन हुआ। इनमें से 12-सदस्यीय जूरी ने जिन 40 फिल्मों का चयन किया, उनमें पहाड़ी संस्कृति पर केंद्रित फिल्म ‘पताल-ती’ भी शामिल है। फेस्टिवल के लिए चयनित इस फिल्म को 14वां स्थान मिला। यह सभी फिल्में 39वें बुसान इंटरनेशनल शार्ट फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जाएंगी। इसके बाद प्रदर्शित चार सर्वश्रेष्ठ फिल्मों को आस्कर समेत विभिन्न विश्वस्तरीय पुरस्कारों के लिए भेजा जाएगा।

निर्माता-निर्देशक रुद्रप्रयाग जिले की दशज्यूला पट्टी के ग्राम क्यूड़ी निवासी संतोष रावत ने बताया कि फिल्म उच्च हिमालयी क्षेत्र में रहने वाली भोटिया जनजाति पर केंद्रित है। यह एक ऐसे किशोर की कहानी है, जो माता-पिता को खो चुका है और अपने दादी-दादा के साथ रहता है। फिल्म की शूटिग चीन सीमा पर स्थित नीती घाटी के अलावा गमशाली व रुद्रनाथ में हुई। निर्देशक रावत कहते हैं कि फेस्टिवल के लिए फिल्म का चयन होने से पहाड़ की संस्कृति को विश्वस्तर पर पहचान मिलेगी। बताया कि वह पहले दक्षिण भारतीय फिल्मों में काम करते थे, लेकिन अब पहाड़ में फिल्म उद्योग को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं।
खास बात यह कि इस फिल्म में रुद्रप्रयाग जिले से चार युवाओं ने अहम भूमिका निभाई। इनमें निर्माता-निर्देशक संतोष रावत के अलावा चोपता-जाखणी निवासी सिनेमेटोग्राफर बिट्टू रावत और कोयलपुर (डांगी-गुनाऊं) निवासी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर गजेंद्र रौतेला व उनके पुत्र कैमरामैन दिव्यांशु रौतेला शामिल हैं। बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आस्कर के लिए गेटवे माना जाता है। एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर गजेंद्र रौतेला ने बताया कि फिल्म की कहानी पहाड़ के ‘जीवन दर्शन’ का प्रतिबिंब है। एक पोते का दादा की आखिरी उम्मीद पूरी करने के लिए कोशिश करना और प्रकृति के साथ सहजीवन व संघर्ष, फिल्म को मानवीय के साथ संवेदनशील भी बनाता है। कैमरे का कमाल, प्राकृतिक रोशनी, लैंड स्केप और कलाकारों की बिना संवाद की अदाकारी फिल्म को अद्भुत बना देती है।
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