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यूपी के शिक्षा जगत के घोटालों का जिन्न आखिर बोतल से निकला बाहर, जीरो टॉलरेंस सरकार पर दिखे गहरे दाग – Navjivan

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उत्तर प्रदेश के शैक्षिक जगत के घोटालों का जिन्न बोतल से बाहर आ चुका है। पहले आयुष कालेजों के दाखिलों में हेराफेरी और उसके बाद छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के कुलपति प्रो. विनय पाठक की कमीशनबाजी का खेल उजागर हुआ। दोनों ही मामलों में एफआईआर दर्ज हुई, दोनों ही प्रकरणों की जांच एसटीएफ कर रही है। दोनों ही प्रकरणों में वर्षों से भ्रष्टाचार की अनगिनत शिकायतें होती रहीं, पर आयुष प्रकरण में सरकार की नींद तब खुली, जब केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए पत्र भेजा, जो सुर्खियों में रहे और दूसरे मामले में प्रो. विनय पाठक की कमीशनबाजी के खेल से तंग आकर परीक्षा कराने वाली कम्पनी ने एफआईआर दर्ज करायी। भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टालरेंस नीति अपनाने वाली योगी सरकार पर यह मामले दाग की तरह देखे जा रहे हैं।

आयुष कालेजों के दाखिले में सीटों की बोली लगी। एसटीएफ की जांच में इसका खुलासा हुआ है। करीबन प्रदेश के हर आयुर्वेद कालेज में एडमिशन में गड़बड़ी पायी गयी। कहीं बड़े स्तर पर तो कहीं बड़ें ओहदेदारों के प्रभाव में। बिना नीट की परीक्षा दिए छात्रों का एडमिशन हो गया और मानकों में फिट बैठने वाले छात्रों का प्रवेश खारिज कर दिया गया। सबसे बड़ी बोली सरकारी कालेजों में एडमिशन के लिए लगी। चार से छह लाख में सरकारी सीट और दो से तीन लाख में प्राइवेट कालेजों की सीट पर दाखिले का रेट चल पड़ा था। विभागीय जानकारों का कहना है कि प्रवेश में यह गड़बड़ी सिर्फ इसी वर्ष ही नहीं हुई है, बल्कि पीछे कई वर्षों से प्रवेश में यही सिलसिला चलता रहा। इसकी बड़े स्तर पर शिकायतें भी की गईं। पर आयुर्वेद निदेशक एसएन सिंह की सत्ता के गलियारों में रसूख की वजह से हर बार शिकायत पर कार्रवाई सिफर रही। बहरहाल एसटीएफ ताजा कार्रवाई में आयुष निदेशालय के निलंबित निदेशक प्रो. एसएन सिंह, नोडल अधिकारी डॉ. उमाकांत यादव, अपट्रान पावरट्रानिक्स के मैनेजर प्रबोध कुमार सिंह समेत 12 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है।


एक प्रकरण में खुद मुख्य सचिव डीएस मिश्रा ने मंडलायुक्त रोशन जैकब को आयुष निदेशालय के निदेशक एसएन सिंह के खिलाफ जांच सौंपी थी। महीनों से उनकी जांच पेंडिंग है। वह भी तब जब जांच रिपोर्ट सबमिट करने के लिए जांच अधिकारी जैकब को कई बार रिमाइंडर भेजा गया। पर उन्होंने वरिष्ठ अफसरों के पत्रों का मान नहीं रखा। जानकारों का कहना है कि यदि शासन स्तर पर पहले से ही की गयी शिकायतों पर समय से जांच और कार्रवाई हो जाती तो सरकार की इतनी छीछालेदार नहीं होती। इससे समझा जा सकता है कि योगी सरकार की भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टालरेंस नीति को नौकरशाही कितनी गंभीरता से ले रही है।

छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के कुलपति प्रो. विनय पाठक जुगाड़ के दम पर लगातार 13 वर्षों तक विश्वविद्यालयों के शीर्ष पद पर बने रहें। इस दरम्यान वह यूपी, उत्तराखंड और राजस्थान के आठ विश्वविद्यालयों में कुलपति बनें। हैरानी यह कि इस बीच अलग-अलग सत्ताधारी दलों के पांच मुख्यमंत्री और तीन गवर्नर का कार्यकाल गुजरा, लेकिन प्रो. पाठक की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा, वह सबकी पसंद बने रहे। अब जब उनके भ्रष्टाचार की परतें खुलनी शुरु हो गयी हैं, तो जेहन में गंभीर सवाल तैरने लगे हैं कि क्या प्रो. पाठक के उपलब्धियों की वजह उनकी योग्यता है? या उनके पीछे खड़े भ्रष्टों के काकस का प्रभाव? या फिर राजनीतिक व्यवस्था का भ्रष्ट प्रबंधन (जुगाड़ तंत्र)?

हमारी पड़ताल में पता चला है कि 25 नवम्बर 2009 को जब विनय पाठक पहली बार उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय हल्द्वानी के कुलपति बने थे। उस समय उनके दिए गए बायोडाटा और चौथी बार अब्दुल कलाम तकनीकी विश्वविद्यालय (एकेटीयू) में कुलपति बनने के लिए दिए गए डिटेल में काफी अंतर है। आरटीआई के तहत मिली जानकारी इसकी पुष्टि करती है। ध्यान देने की बात यह है कि जब 2015 में एकेटीयू में उन्हें कुलपति बनाया गया था। उस समय प्रदेश में अखिलेश सरकार थी और तत्कालीन राज्यपाल रामनाईक ने एकेटीयू में कुलपति चयन की सर्च कमेटी का अध्यक्ष शिक्षाविद पदमश्री संजय धाण्डे को बनाया था। आपको जानकर हैरानी होगी कि धाण्डे खुद कई जर्नल्स के प्रकाशन में पाठक के साथ सह लेखक थे। उन्होंने ही प्रो. पाठक की दावेदारी को आगे बढाया। ये घटनाक्रम प्रो. पाठक के योग्यता और उनके जुगाड़ तंत्र की असलियत उजागर करने के लिए पर्याप्त है, साथ ही उनके पीछे खड़े काकस की तरफ इशारा भी कर रहे हैं।

इन 13 वर्षों में प्रो. पाठक के काम करने का तरीका एक जैसा ही रहा। हर जगह उन पर गड़बड़ियों के आरोप लगते रहे। उसकी खूब जमकर आलोचना भी होती रही। पर उनके जुगाड़ तंत्र के आगे किसी की न चली। वर्ष 2009 में जब पहली बार वह उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति बने तो आनन फानन में उन्होंने तमाम अहम पदों पर अपने करीबियों को भर्ती कर लिया। वह यहीं नहीं रुके उन्होंने वर्ष 2012 में वर्धमान महावीर मुक्त विश्वविद्यालय और वर्ष 2015 में एकेटीयू के कुलपति के पद पर नियुक्त होते ही चहेतों को नियुक्तियां दी। उनकी शिकायतें होती रहीं, पर कार्रवाई आगे नहीं बढी।

मौजूदा घोटालों के आरोपों की एसटीएफ जांच कर रही है। हाईकोर्ट ने भी प्रो. पाठक को गिरफ्तारी से बचने के लिए राहत नहीं दी है। फिर भी वह कुलपति पद पर बने हुए हैं, सवाल इस पर भी खड़े हो रहे हैं। पुलिस सूत्रों का कहना है कि पाठक सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। एसटीएफ उनकी गिरफ्तारी के लिए राजभवन से अभियोजन की स्वीकृति मांगने की तैयारी में है। उत्तर प्रदेश विश्वविद्यालय महाविद्यालय महासंघ के अध्यक्ष डा. वीरेंद्र सिंह चौहान का कहना है कि इसके पहले गड़बड़ी के आरोपों पर आगरा और अवध विश्वविद्यालय के कुलपतियों को तुरंत हटाया गया है। पर पाठक के प्रकरण में राजभवन चुप्पी साधे है, जबकि विश्वविद्यालय के लाखो छात्रों का भविष्य दांव पर है। बहरहाल, एसटीएफ के पास अब तक विभिन्न विश्वविद्यालयों में कुलपति रहे उनके कार्यकाल के कारनामों की शिकायतें पहुंच रही है।

छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के कुलपति प्रोफ़ेसर विनय पाठक समेत दो लोगों के खिलाफ लखनऊ के इंदिरानगर थाने में एफआईआर दर्ज करायी गयी। यह एफआईआर कई विश्वविद्यालयों में परीक्षा संचालन कराने वाली कंपनी डीजीटेक्स टेक्नोलॉजी इंडिया के एमडी डेविड मारियो डेविस ने कराया। आरोप है कि प्रो पाठक ने डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा के कुलपति पद पर रहते हुए बिलों के भुगतान के लिए 1.41 करोड़ रुपये कमीशन लिया और कमीशन की बकाया धनराशि न मिलने पर कंपनी को ब्लैकलिस्टेड करने की धमकी दी। एफआईआर दर्ज होने के बाद प्रकरण की जांच एसटीएफ को सौंपी गयी। डेविड का कहना है कि उन्होंने प्रो पाठक खुर्रमनगर के रहने वाले एक्सेल आईसीटी कम्पनी के मालिक अजय मिश्रा से जरिए कमीशन दिया।

एकेटीयू के कुलपति रहने के दौरान प्रो पाठक पर विश्वविद्यालय की 2400 करोड़ की एफडी तुड़वाकर फंड को अन्य जगहों पर निवेश करने का आरोप।  

इंस्टीट्यूट आफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलाजी (आइईटी), लखनऊ में अपने करीबी को
कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोफेसर बनाकर 10 वर्ष की वरिष्ठता दी। उसे ही बाद में आइईटी का निदेशक बनाया।

आइईटी में संविदा शिक्षकों के 46 पद हैं पर पाठक ने 68 पदों पर की नियुक्ति।
आइईटी के निदेशक पांच लाख तक की फाइल को स्वीकृति दे सकते हैं, पर उन्होंने 46 लाख तक की फाइल पास करने की स्वीकृति दी।
अपने प्रभाव से आइईटी में डिप्टी रजिस्ट्रार के पद पर ऐसे व्यक्ति को चयनित किया, जिसकी मार्कशीट निकली फर्जी।

एकेटीयू के कुलपति रहने के दौरान प्रो. पाठक चयन समिति के सदस्य भी थे।

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