बिहार के मुकेश कुमार कैसे बने टीम इंडिया का हिस्सा – BBC

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कौन है बिहार का मुकेश, जिसका भारतीय क्रिकेट टीम में गेंदबाज़ी के लिए चयन हुआ है?
बिहार का एक ज़िला है गोपालगंज. उत्तर प्रदेश से सटा हुआ. उसी ज़िले की धूसर पिचों पर खेलते हुए एक नौजवान ने आज भारतीय क्रिकेट टीम में अपनी जगह बनाई है.
उस नौजवान का नाम है, मुकेश कुमार (28 वर्ष). मुकेश दाएं हाथ के तेज गेंदबाज़ हैं. उन्हें पिछले माह इंडिया ए टीम में न्यूज़ीलैंड ए के खिलाफ़ खेलने का मौका मिला था, और आईपीएल में वे दिल्ली कैपिटल्स के लिए नेट पर गेंदबाजी करते रहे हैं.
संभावना है कि मुकेश 6 अक्टूबर को दक्षिण अफ़्रीका के ख़िलाफ़ अपना पहला इंटरनेशनल मैच खेल सकते हैं.
आज जब मुकेश का सेलेक्शन भारतीय क्रिकेट टीम में हुआ है, तो उनके घर पर लोगों का जमावड़ा लगा हुआ है.
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बधाइयों का तांता टूटने का नाम नहीं ले रहा, लेकिन यह बधाइयां यूं ही नहीं आ रहीं. मुकेश के लिए यहां तक पहुंचना आसान नहीं था.
वो भी ऐसे राज्य में जहाँ खेल-कूद के लिए बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर का अभाव है. साल 2000 से 2018 के बीच रणजी खेलने के लिए कोई टीम नहीं गई. खिलाड़ियों को पलायन करना पड़ा. ज़ाहिर तौर पर यह मुकेश और उनके परिवार के लिए लंबा संघर्ष है.
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चाचा कृष्णा सिंह मुकेश के भारतीय क्रिकेट टीम में सेलेक्शन और संघर्ष पर बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "घर की ज़िम्मेदारी मुझ पर ही थी, बाकी लोग बाहर कमाने चले गए थे. शुरू के दिनों में मैं मुकेश के क्रिकेट खेलने के खिलाफ़ रहा. मैं उसे लगातार मना करता रहता था. मुझे लगता था कि खेल-कूद की वजह से कहीं झगड़ा-झंझट न हो जाए. लोगों की शिकायतों और बदनामी का डर था. लेकिन वो मानने वालों नें नहीं था.''
''वो छिपकर खेलने निकल जाया करता था. जब कहीं-कहीं खेलने पर मुकेश को 50-100 रुपया और ट्रॉफी मिलने लगा और उसकी खेल की वजह से हमारे गांव (काकड़कुंड) और परिवार का भी नाम चारों तरफ होने लगा, लोग मुकेश के बढ़िया खेल पर हमें भी बधाई देते, तो हमें एहसास हुआ कि मुकेश कुछ अच्छा कर रहा है. लेकिन बिहार में तो खेल की उतनी व्यवस्था है नहीं तो कोलकता चले गए. कोलकता में मुकेश के पिता (काशीनाथ सिंह) टैक्सी का कारोबार करते थे. जरूरत पड़ने पर टैक्सी भी चलाते थे.''
2019 में उनकी मौत हो गई. उनकी मौत के बाद टैक्सी का कारोबार ठप हो गया. उसे कोई आगे चला नहीं पाया. मुकेश खेलने में ही लग गए. उनके बड़े भाई कोलकाता में नौकरी कर गुज़ारा करते हैं. बंगाल में ही खेलते खेलते मुकेश वहीं और लोगों के संपर्क में आए और लगातार अच्छा खेलते हुए यहां तक पहुंचे हैं. मुकेश के सेलेक्शन से पूरा गांव खुश है. परिवार के लिए यह गर्व के दिन हैं."
मुकेश के परिवार के बारे में पूछने पर चाचा कृष्णा सिंह कहते हैं, "देखिए वैसे तो हमारा संयुक्त परिवार ही है. मुकेश 6 भाई बहनों के परिवार में सबसे छोटे हैं. परिवार में मुकेश से बड़े एक और भाई हैं और चार बहने हैं. मुकेश को छोड़ कर बाकी सबकी शादी हो गई है."
मुकेश कुमार कौन हैं?
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मुकेश के यहां तक पहुंचने में उनके सीनियर और भाई सरीखे अमित सिंह की भी अहम भूमिका है. दोनों एक ही ज़िले में रहते थे, अमित एक तरह से मुकेश के शुरुआती दिनों के कोच भी रहे.
अमित सिंह मुकेश की यात्रा और संघर्ष के साथ ही सबकी नज़रों में कब आए? इस सवाल पर वो बीबीसी से बातचीत में कहा, "देखिए यह साल 2006-07 की बात है. मैं हेमंत ट्रॉफी खेला करता था. ज़िले की टीम का कप्तान भी था. तब हमने एक टैलेंट हंट प्रतियोगिता कराई थी. मुकेश तभी सबकी नज़रों में आए.''
उन्होंने बताया, ''तब मुकेश ने 7 मैच खेलते हुए 1 हैट्रिक समेत 35 विकेट झटके थे. लोग उन्हें जानने लगे थे लेकिन पहचान से तो सिर्फ काम चलेगा नहीं."
"बिहार से कोई रणजी की टीम बची ही नहीं थी. इस वजह से मुकेश ने पश्चिम बंगाल का रुख किया. वो वहीं से लगातार दो सीजन रणजी खेले. 30 से अधिक विकेट झटके. उसके बाद की कहानी तो अब सबके सामने है."
अमित सिंह की अब भी मुकेश कुमार से लगभग रोज़ ही बात होती है.
वो बताते हैं कि ऐलान से पहले मुकेश को उम्मीद थी कि इस बार उन्हें सफलता मिलेगी. उनका सेलेक्शन पहले टेस्ट टीम में हो सकता है.
मुकेश कुमार लाल गेंद के साथ अपेक्षाकृत सहजता से गेंदबाज़ी करते हैं, लेकिन जब साउथ अप्रीका के साथ वन डे खेलने के लिए उनका सेलेक्शन हुआ तो उन्हें भी बड़ी खुशी हुई.
बीसीसीआई की ओर से जारी सूचनाओं के हिसाब से मुकेश 6 अक्टूबर को अपना पहला इंटरनेशनल मैच खेल सकते हैं.
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मुकेश ने अपने खेल की शुरुआत, से लेकर मैट्रिक और इंटर तक की पढ़ाई बिहार के गोपालगंज से ही की है.
बाद में वे बेहतर खेल सुविधाओं और इन्फ्रास्ट्रक्चर की तलाश में पश्चिम बंगाल चले गए.
उनके परिवार का वहां टैक्सी का कारोबार है. वहीं से खेलते हुए बीए की पढ़ाई भी पूरी की.
पश्चिम बंगाल की टीम से ही रणजी खेले और बेहतरीन खेल की वजह से चयनकर्ताओं की नज़र में आए.
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बिहार जैसे राज्य में रह-रहकर ऐसे खिलाड़ियों के नाम सामने आते रहते हैं, जो अपनी जिजीविषा के दम पर कभी आईपीएल तो कभी भारतीय क्रिकेट टीम तक पहुंच जाते हैं.
लेकिन ऐसे खिलाड़ियों का बिहार से निकलकर कहीं तक पहुंचना नियम के बजाय अपवाद है.
बिहार जैसे राज्य में क्रिकेट के बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के अभाव पर बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष दिलीप सिंह बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "देखिए देश के दूसरे राज्यों के इतर बिहार के भीतर खेल में भी राजनीति घुसी हुई है.
दूसरों राज्यों में भी राजनीति होती है लेकिन ज़रा लिहाज रहता है. सरकारें बदलती हैं लेकिन चीज़ें चलती रहती हैं. यहां सबकुछ रुक सा जाता है.''
''आपसी राजनीतिक खींचतान की वजह से साल 2000-2018 के बीच बिहार की टीम रणजी खेलने ही नहीं जा सकी. इसका प्रभाव खेल और खिलाड़ियों पर भी पड़ा. बिहार को बीसीसीआई ने एसोसिएट की मान्यता भी साल 2010 में दी. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद साल 2018 से हमारी टीम रणजी में भाग ले रही है.''
''इस बीच दो साल कोविड की भेंट चढ़ गया. चला आया. हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि राज्य में खेल के लिए बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर बहाल कर सकें, लेकिन एक बात तो तय है कि अच्छे खिलाड़ी राज्य में सुविधाओं और संसाधनों के अभाव में कहीं और पलायन करेंगे. यह स्वाभाविक है."
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